श्रीदत्त शुक्ल "नगरामी"
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| Introduction | "विस्तृत नभ का कोना कोना, मेरा न कभी अपना होना, परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी, मिट आज चली, मैं नीर भरी दुःख की बदली." महादेवी वर्मा जी की यह पंक्तियाँ, जबसे इन्हें जाना, मेरे जीवन में आती जाती सांस बन गयीं तब मैं दसवीं कक्षा में था. मेरी माँ का देहांत हुआ(1950) और दुःख जो मेरे मन में बैठा तो फिर अंतर्मन का साथी ही बना रहा. लखनऊ जिले के ग्राम व क़स्बा नगराम में जन्मा(1935), ग्रामीण परिवेश से शहर में आया लेकिन मन से वहीँ रहा. कोशिस भी की पर बहुत बदल नहीं पाया. खैर,यहाँ मैं अपनी जीवन कथा नहीं लिख रहा हूँ (वैसे भी वह है ही कितनी और किस काम की). इस ब्लॉग की बात करें. २६ दिसम्बर २०१० को एक निकट परिवार में मिलने गया. कभी हम रानीखेत में आस पास रहते थे.बात बात में मैने कहा कि कागज़ बहुत इकठ्ठा है मेरे पास आज कल उसे नष्ट कर रहा हूँ उस परिवार की लड़कियों को(जिनसे मुझे स्नेह है और जो बहुत ही सुयोग्य हैं) पता है की मैं कुछ न कुछ लिखता रहता हूँ. लेकिन संजोता नहीं,कभी कुछ छपा भी है तो मेरे पास संग्रहीत नहीं है. उन्होंने आग्रह किया की जहाँ जो कुछ मेरा लिखा हुआ मिले मैं उन्हें दे दूं. मेरे ज्येष्ठ पुत्र मेरे साथ में थे. घर लौट कर उन्होंने यह तकनीकी कागज और कलम थमा दिया की यहाँ लिखूं या एकत्र करूँ. शायद अब समय नहीं बचा फिर भी.... दिल के बहलाने को ग़ालिब...... |
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