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shashi shekhar
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Introductionपत्रकार और बेकार में ज्यादा फर्क नहीं होता. दोनों के बीच एक बारीक धागा है. धागा टूटा नहीं कि पत्रकार बेकार और बेकार पत्रकार बन जाता है. इसीलिए सोचा एक ब्‍लॉग बना लूं. बेकारी के दिनों में दिन आराम से कटेंगे. चाय दुकान. क्योंकि, जब नौकरी नहीं थी तब यहां बहुत वक्त गुजारा है. दोस्तों के साथ. दो बट्टा तीन, तीन बट्टा पांच. सुबह का 4 घंटा और शाम से रात दस बजे तक. जब तक चाय दुकान पर होते है, खुद की चिंता कम, देश-दुनिया की ज्यादा सताती है. जम कर बहस, चर्चा, लफ्फाजी या कभी-कभी बक....भी. आप सभी, जो चायदुकान से प्रभावित है, का स्वागत है यहां. - शशि शेखर
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