Kanak
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| Gender | Female |
|---|---|
| Industry | Communications or Media |
| Occupation | Sub-Editor |
| Location | Noida, U.P., India |
| Introduction | मेरी जिंदगी का सफर कभी धूप तो कभी छांव के साये के बीच अनवरत जारी है, राह में आयीं तमाम मुश्किलों ने समय के समन्दर में मुझे तैरना भी सिखलाया तो कभी-कभी मिली छोटी सी खुशी मेरी आंखों से क्या लुढ़की कि यह बूंद ही समूचा समन्दर हो चली, और तिस पर मेरी जिद् मुझे नये सफर का हौसला देती रही। जब भी थोड़ा सुस्ताने बैठी तो मेरी तन्हाई की आहों के बीच, मेरे अपनों की यादें अनवरत चलने का संबंल देने से नहीं चूकी, मेरे कदमों की रफ्तार मुझे यह यकीन भी दिलाती है? भविष्य में मेरी हथेली से कुछ छूटेगा, क्या छूटेगा कह नहीं सकती, बहुत कुछ मिलेगा यह यकीन है। ... सो लिखती रहती हूं ... कभी भीड़ में तो कभी तन्हा ....। |
| Interests | शब्दों को कागज पर उकेर कर जो कशीदे गढ़ती हूं, वह मुझे आत्मिक शान्ति पहुंचाते हैं। भीड़ के बीच मैं इन्हीं शब्दों में खुद को खोज और सहेज कर रख पाती हूं। जब खुद को खोजने से समय बच चलता है तो फिर मैं उन लोगों के साथ हो लेती हूं, जो नितांत अकेली सी दिखती हैं? सोचती हूं किताबों को ही नहीं दूसरों के चेहरे को पढ़कर भीड़ भी हुआ जा सकता है और भीड़ में खोया भी जा सकता है....? |
| Favorite movies | एक अलहदा जीवन जीने का मौका सिनेमा देती है, झूठी ही सही तमाम सुख-सुविधायें, रुमानियत, ख्याल और ख्वाब पाकर जैसे जीवन खिल उठता है। सिनेमा जिन्दगी को लेकर सवाल पर्दे पर उगाता भी है और उठाता भी है। यकीनन यह तीन घन्टे किश्तों में ही सही जीना बहुत अच्छा लगता है, चाहे वह श्वेत-श्याम ही क्यूं न हो? कभी-कभी खुद को पाकर अच्छा लगता है....? |
| Favorite music | यह दौलत भी ले लो, यह शोहरत भी ले लो, सुनकर कागज की कश्ती और बरसात का पानी मिल जाने की चाह जाग उठती है, तो कभी इसी चाह में जिन्दगी आगे चल कर प्यार का पहला खत लिखने में कुछ देर तो लगती है, नये परिन्दों को उडऩे में कुछ देर तो लगती है कहने को आतुर दिखती है। सुर-संगीत तो यही कहते हैं कि सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा ..... इसलिये ही पसंद हैं। |
| Favorite books | प्रेमचन्द, टैगौर, हरिवंशराय बच्चन, सुभद्राकुमारी चौहान को पढ़ते-पढ़ते जब कभी अमृता प्रीतम को भी पढने की चाह भी जाग ही जाती है....। |

