CHANDAN
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| Introduction | जो कुछ हूं...उसे खुद चुना..लेकिन ना जाने क्यों कभी-कभी पसंद बोझिल लगने लगती है...कभी आत्ममुग्धता का भाव अच्छा लगता है...तो कभी नैराश्य में मस्ती ढूंढता हूं...कभी दौड़ना चाहता हुं..तो कभी अंधेरा कोना अच्छा लगता है...कभी आपबीती कहने को मन करता है...तो कभी जी करता है कि जगबीती सुनता रहूं |
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