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Raj. K. Mishra
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GenderMale
LocationIndia
Introductionमुझमे शंकर के ब्रह्म की हड्डी खराब हो गई है अपने ही भार के कारण। तो क्या मैं केवल केवल गति? एक मनोवैज्ञानिक कंस्ट्रक्ट? लाप्लास, तुम भी झूठे हो। जलती है मेरी चमड़ी, जलता है मेरा मन, साक्षी हूँ इस वेदना का। अणु-परमाणु घिरा तो है मुझमे, "मैं"की इस चेतना से। हाँ,एक कण उछला नाद के साथ,आत्मा या ब्रह्म नही, भ्रम तो कतई नही! दाएँ से भी आदमी, बाएं से भी आदमी, आदमी, जिसे सुख भी होता है, आदमी, जिसे दुख भी होता है। यही मेरा सत है। मेरी चेतना में अनुभवरूपी जिब्रील द्वारा उतारा गया। ■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■■ अस्सी के दशक में जन्मा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और परस्नातक डिप्लोमा करने के पश्चात झारखण्ड सरकार में नौकरी किन्तु मन मे खटकने वाली एक अनाम सी कमी, एक बार-बार कुरेदनेवाले प्रश्न के जवाब ढूंढने के प्रयास ने दर्शन पढ़ने को बाध्य किया और इसी क्रम में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से दर्शन में परस्नातक तथा नेट की परीक्षा पास की। वर्तमान में फोकलोर और कल्चरल स्टडीज में परस्नातक डिप्लोमा का विद्यार्थी। इंडियन काउंसिल ऑफ फ़ॉलोसॉफिकल रिसर्च का सदस्य।
Interestsदर्शन, मनोविज्ञान, कॉस्मोलॉजी, एस्ट्रोनॉमी, भाषा, प्रकृति आदि
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