कुणाल देव
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| Introduction | मन का राजा हूं और गुलाम भी। मन मेरे दिल की सुनता है और मैं मन की सुनता हूं। इसलिए, वाद-विवाद की चिंता से दूर जो अच्छा लगता है, वही करता हूं। पढ़ता हूं, लिखता हूं, गुनता हूं और बुनता हूं। मुझे शब्दों से प्यार है और उसके चाहने वालों से भी। मतलब जो शब्दों के रसिया हैं उनके साथ मेरी चाहत अपरिहार्य हो जाती है। |
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